काले जादू का शहर मयोंग गाँव...कामख्या मंदिर रहस्य और किस्से- कहानियां

 

काम रूप का नाम आते ही कामाख्या देवी के मंदिर का ध्यान अवश्य आता है | हिन्दू पौराणिक कथा अनुसार माँ सती के शरीर के टुकड़े सुदर्शन चक्र से कट  कर 51  जगहों पर गिरे थे | ये सभी जगह शक्ति पीठ के नाम से जानी जाती हैं|  माँ सती  का योनि भाग जहाँ गिरा वह कामाख्या शक्ति पीठ के नाम से जाना जाता है|  यह मंदिर नीलाचल पहाड़ी पर स्थित है | यह स्थान कला जादू के लिए प्रसिद्ध है|  तांत्रिक यहाँ पर अपनी सिद्धि और साधना के लिए आते है | यह स्थान कला जादू के लिए आवश्यक माना जाता है|  यहाँ पर तांत्रिको द्वारा दी जाने वाली नर बलि, पशु बाली  पक्षियों की मुक्ति की कहानियां सुनी और पढ़ी  जा सकती है | साधना में लीन  अघोरियों को देखा जा सकता है | सती स्वरूपनी आधयषाकरी  महा भैरवी कामाख्या तीर्थ विश्व का सर्वोच्च कौमारी तीर्थ  भी माना जाता है | इसलिए यहाँ कौमारी पूजा अनुष्ठान का भी महत्व है|  यहाँ आध्या -शक्ति कामाख्या कौमारी रूप में सदा विराजमान हैं|  यहाँ पर सभी जातियों और वर्णो की कौमारियां वन्दनिये और पूजनीय है | यह मन जाता है की वर्ण  भेद करने पर साधक की सिद्धियां ख़तम हो जाती है|

इस उपलक्ष्य  में मनाया जाने वाला अम्बुवाची पर्व का काफी महत्वपूर्ण है|  इस दौरान दिव्य शक्तियों के अर्जन ,तंत्र मंत्र में निपुण साधक अपनी शक्तियों का पुनर्श्रावण  अनुष्ठान कर शक्तियों को स्थिर रखते है | माँ भगवती के रजस्वला होने पूर्व गर्भ गृह में स्थित महा मुद्रा पर सफ़ेद कपड़ा चढ़ाया जाता है|  तीन दिन के लिए मंदिर के कपाट बंद  हो जाते है | तीन दिन उपरांत कपाट खोले जाते है | रक्त वर्ण हुए वस्त्र श्रद्धालुओं को प्रसाद स्वरूप दिए जाते है |


इस दौरान यहाँ पर भारत, बांग्ला देश, तिब्बत और अफ्रीकी देशों से तंत्र साधक अपनी साधना के सर्वोच्च शिखर को प्राप्त करते हैं|  वाममार्ग साधना का तो यह सर्वोच्च पीठ है,   मछँदर नाथ , गोरख नाथ, लोनाचमारी और ईस्माइलजोगी आदि तंत्र साधको ने अपनी साधन करके सांवर तंत्र में अपना स्थान बना कर अमर हुए है | अम्बुवाची पर्व साल में एक बार मनाया जाता है|  शास्त्रों के अनुसार सत युग में यह पर्व 16 वर्षो में एक बार आता था|  द्वापर में 12  वर्षो में, त्रेता युग में 7  वर्ष में और कलयुग में प्रत्येक वर्ष मनाया जाता हैं| इस दौरान माँ भगवती के कपाट अपने आप बंद हो जाते थे| और दर्शन भी निषेध हो जाते थे|  इस दौरान पूरे विश्व के उच्च कोटि के तांत्रिकों , मंत्र साधको, अघोरियों और साधकों का जम घट लग जाता हैं| अपनी सिद्धियां आगे भी बनी रहें , इसके लिए साधना करते है| तीन दिनों बाद मंदिर के कपाट खुल जाते है और इसके साथ विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है|

एक बार मद में चूर असुर राज नर्का  सुर  माँ भगवती से विवाह करने का दुराग्रह कर बैठा | कामाख्या महामाया ने उस का अंत समय निकट जान कर उसे नीलाचल पर्वत के चारों और सीढ़ियां बनाने और कामाख्या मंदिर के पास एक विश्राम गृह सुबह दिन निकलने से पहले बनाने को कहा और यदि ऐसा नहीं कर पाए तो तुम्हारी मौत निश्चित है |  गर्व में चूर असुर ने चारों और सीढ़ियां प्रातः कल होने सर पूर्व ही बना दी| विश्राम गृह का निर्माण कर रहा था तभी महामाया के मायावी मुर्गे ने बांग  लगा दी | जिससे क्रोधित हो नरका सुर ने मुर्गे का पीछा किया और ब्रह्मा पुत्र नदी के दूसरे तट  पर जा कर उसका वध कर डाला | यह जगह आज भी कुक्टाचकी के नाम से जानी जाती है | माँ भगवती की माया से भगवान विष्णु ने  नरका सुर का वध कर दिया | नरका सुर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र भगदत्त काम रूप का राजा बना | भगदत्त का वंश लुप्त होने पर काम रूप राज्य छोटे छोटे भागों में बट गया |और सामंत राजा राज्य करने लगे |

 मुनि वशिष्ठ के श्राप के कारण देवी लुप्त हो गयी | फलस्वरूप काम रूप का प्रतिष्ठित कामाख्या मंदिर धवंश पर्याय हो गया | मायावी कामाख्या के दर्शन करने से पूर्व महा भैरव  उमानंद के दर्शन फल दायक होते है | यह मंदिर गुवाहाटी शहर के नज़दीक ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य एक टापू पर स्थित है | यह एक प्राकृतिक शैल द्वीप है , जो तंत्र साधना का सर्वोच्च सिद्धि सती का शक्ति पीठ है | इस टापू को मध्यांचल के नाम से भी जाना जाता है | यहीं पर सदा शिव समाधी में लींन थे| तभी काम रूप ने बाण मर कर घायल कर दिया था | माँ भगवती के महा तीर्थ योनि मुद्रा पर ही कामदेव को पुनः जीवन दान मिला था |


कामाख्या मंदिर के रहस्य-


1. अम्बुवाची पूजा :- माना जाता है की जून माह (अषाढ़  माह की सप्तमी ) से यह मेला मनाया जाता है | इन तीन दिनो  यह मंदिर माँ के रजस्वला होने पर बंद रहता है | चौथे दिन विशेष पूजा के साथ यह मंदिर आम जनता के लिए खुलता है |

2. विभिन्न किंवदंतियों और पौराणिक कथाओं के अनुसार इस मंदिर में भगवान गणेश के अनोखे चित्र बने है |

3. यहाँ पर दैनिक पूजा के अलावा निम्नलिखित पूजा और भी होती  है :- दुर्गा पूजा, अम्बुबाची पूजा, पोहन बिया, दुर्गा डियूल , बसंती पूजा, मदन डियूल पूजा।

4. दुर्गा पूजा नवरात्रों में होती है |

5. नरका सुर द्वारा बनाई  गयी सीढ़ियों को मेखलायजा पथ कहते है | दारंग में  कुक्टाचकी स्थित है |

6. पोहंन  बिया: - पूष मास के दौरान भगवान कामेश्वर और कामेश्वरी की प्रतीकात्मक शादी के रूप में पूजा होती है |

7. बसंती पूजा :- यह पूजा चैत्र मास में आयोजित की जाती है |

        

इस मंदिर में देवी की कोई मूर्ति नहीं है| यहाँ पर देवी के योनी भाग की पूजा होती है| .कामाख्या में माता सती का योनी भाग गिरा था ( असामी  में योनी को गुव्हा कहते है )|  मंदिर में एक कुण्ड है जो हमेशा फूलों से भरा रहता है | इस के पास ही एक और मंदिर है जहाँ देवी की मूर्ति स्थापित है |  अम्बुबाची पर्व के बाद भगतों को प्रसाद स्वरूप एक लाल रंग का गीला कपड़ा दिया जाता है| जिसको अम्बुबाची वस्त्र कहते है | यहाँ पर देवी काली के दस रूप -धूमावती, मातंगी, बगोला , तारा, कमला , भैरवी , चिन्मासा, भुवनेश्वरी  और त्रिपुरा सुन्दरी की मूर्तियाँ देखने को मिल जाएगी |


मयोंग गाँव के जादू से सम्बंधित कुछ किस्से-
 

 असम के जतिंगा गांव में सितंबर से अक्टूबर के महीने में रात के समय पक्षियों का एक बड़ा समूह  काफी तेजी से जंगल की और से उड़ता हुआ आता है और इमारतों और पेड़ों से टकरा कर आत्महत्या कर लेता है| पक्षियों द्वारा सामूहिक आत्महत्या एक रहस्य का विषय है | आसाम का काला जादू और तंत्र सिद्धि से कठिन से कठिन समस्या का समाधान किया जा सकता है| इसके प्रयोग से मुश्किल से मुश्किल परिस्थियों पर विजय पायी जा सकती है| ये जादू विद्या, प्रेम विवाह, गृह क्लेश, धन की रूकावट, व्यापार में हानि, नौकरी न मिलना, प्रमोशन में अड़चन, दुश्मन या सौतन से छुटकारा, अदालत में मामले, संतान की समस्या आदि में काफी असरदार होता है|

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अपराजिता एक लता जातीय बूटी है जो जो की वन उपवनो में विभिन्न वृक्षों या तारों के सहारे उर्ध्वगामी होकर सदा हरी भरी रहती है |यह समस्त भारत में पाई जाती है ,इसकी विशेष उपयोगिता बंगाल में दुर्गा देवी तथा काली देवी की पूजा के अवसर पर स्पष्ट दर्शित होती है |नवरात्रादी के विशिष्ट अवसर पर नौ वृक्षों की टहनियों की पूजा में एक अपराजिता भी होती है | यहाँ के कुछ अघोरी लोग तो इतने शक्तिशाली हैं कि वह पूरा साल गायब होकर ही साधना करते रहते हैं| यहाँ के गाँव के लोग अपने बच्चों को बचपन से ही काला जादू सिखाते हैं| जब शिव भगवान सती का शव लेकर जा रहे थे, तब उनकी ‘योनी’ इस स्थान पर गिरी थी. यह मंदिर काले जादू और टोटकों के लिए काफी मशहूर है| मंदिर के आसपास के जंगलों में कई संत तंत्र साधना ही करते रहते हैं| इस मंदिर के अंदर भी एक प्राकृतिक गुफ़ा है जहां पानी का झरना भी है| बोला जाता है कि यह पानी भी कम शक्तिशाली नहीं हैसबसे अधिक हैरान करने वाली बात यह है कि काले जादू के नाम पर असम में हर साल हजारों उल्लूओं की बलि दे दी जाती है| यहाँ के काला  जादू की सनसनीखेज बात यह है कि यहाँ का काला जादू 100 प्रतिशत सही सिद्ध हो रहा है| यहाँ के लोग काले जादू के लिए आत्माओं का भी प्रयोग करते हैं| इस तरह से आज आप जान गये हैं कि असम जादू-टोने का देश क्यों बोला जाता है  और आज भी यहाँ लोग जाने से क्यों डरते हैं| वैसे अगर आप कभी असम घूमने जायें तो सावधानी जरूर बरतें|

 विशेषज्ञ के अनुसार, काला जादू बहुत ही दुर्लभ प्रक्रिया है, जिसका उपयोग कर के किसी भी परिस्थिति को अंजाम दे सकते है, चाहे वो कितनी भी शक्तिशाली क्यों ना हो| काला जादू करने के लिए एक गुड़िया उपयोग में ली जाती है, वो किसी भी खाद्य प्रदार्थ से बनी होती है| विशेषज्ञ के द्वारा इसमे विशेष मंत्र से जान डाली जाती है| उसके बाद जिस किसी पे भी काला जादू करना है उसका नाम लिख के गुड़िया को जाग्रत किया जाता है।

वुडू का रहस्य-

ऐसा माना जाता है की, 1847 में एरजुली डेंटर नाम की वुडू देवी ने एक पेड़ पर अवतार लिया था, उसे सभी सुंदरता और प्यार की देवी के नाम से जानते थे, वुडू देवी ने कई लोगो को परेशानियों और बीमारियों से मुक्त कराया| इस तरह वह प्रसिद्ध हो गयी| लेकिन, एक पादरी को यह सब पसन्द नही आया उसने ईर्ष्या द्वेष में पेड़ के तने को कटाव दिया। इसके बाद वहा लोगो ने एक वुडू देवी की मूर्ति बनाई और पूजा करने लगे. 

काले-जादू को अलग अलग धर्मों में अलग अलग नाम से जाना गया। आज भी ऐसे सैकड़ों बौध भिक्षु हैं, जिनके पास कुछ अद्भुत शक्तियां मौजूद हैं। कुछ बरस पहले थाईलैंड के एक बौद्ध भिक्षु का चमत्कार पूरी दुनिया के लिए अजूबा बन गया था। ध्यान में डूबे ये बौद्ध भिक्षु बिना किसी सहारे जमीन से करीब एक फीट ऊपर उठ गया था। लेकिन सवाल ये है कि क्या वाकई काला-जादू होता है?.क्या वाकई हिन्दुस्तान के उस रहस्यमयी गांव में ऐसी कोई शक्तियां आज भी मौजूद हैं?

 

 आसाम को ही पुराने समय में कामरूप प्रदेश के रूप में जाना जाता था। कामरुप प्रदेश को तन्त्र साधना के गढ़ के रुप में दुनियाभर में बहुत नाम रहा है। पुराने समय में इस प्रदेश में मातृ सत्तात्मक समाज व्यवस्था प्रचलित थी, यानि कि यंहा बसने वाले परिवारों में महिला ही घर की मुखिया होती थी। कामरुप की स्त्रियाँ तन्त्र साधना में बड़ी ही प्रवीण होती थीं। 

बाबा आदिनाथ, जिन्हें कुछ विद्वान भगवान शंकर मानते हैं, के शिष्य बाबा मत्स्येन्द्रनाथ जी भ्रमण करते हुए कामरुप गये थे। बाबा मत्स्येन्द्रनाथ जी कामरुप की रानी के अतिथि के रुप में महल में ठहरे थे। बाबा मत्स्येन्द्रनाथ, रानी जो स्वयं भी तंत्रसिद्ध थीं, के साथ लता साधना में इतना तल्लीन हो गये थे कि वापस लौटने की बात ही भूल बैठे थे। बाबा मत्स्येन्द्रनाथ जी को वापस लौटा ले जाने के लिये उनके शिष्य बाबा गोरखनाथ जी को कामरुप की यात्रा करनी पड़ी थी। 'जाग मछेन्दर गोरख आया' उक्ति इसी घटना के विषय में बाबा गोरखनाथ जी द्वारा कही गई थी। 

कामरुप में श्मशान साधना व्यापक रुप से प्रचलित रहा है। इस प्रदेश के विषय में अनेक आश्चर्यजनक कथाएँ प्रचलित हैं। पुरानी पुस्तकों में यहां के काले जादू के विषय में बड़ी ही अद्भुत बातें पढऩे को मिलती हैं। कहा जाता है कि बाहर से आये युवाओं को यहाँ की महिलाओं द्वारा भेड़, बकरी बनाकर रख लिया जाता था।

आसाम यानि कि कामरूप प्रदेश की तरह ही बंगाल राज्य को भी तांत्रिक साधनाओं और चमत्कारों का गढ़ माना जाता रहा है। बंगाल में आज भी शक्ति की साधना और वाममार्गी तांत्रिक साधनाओं का प्रचलन है। बंगाल में श्मशान साधना का प्रसिद्ध स्थल क्षेपा बाबा की साधना स्थली तारापीठ का महाश्मशान रहा है। आज भी अनेक साधक श्मशान साधना के लिये कुछ निश्चित तिथियों में तारापीठ के महाश्मशान में जाया करते हैं। महर्षि वशिष्ठ से लेकर बामाक्षेपा तक अघोराचार्यों की एक लम्बी धारा यहाँ तारापीठ में बहती आ रही है। आपने 64 कलाएं और अष्ट सिद्धि के बारे में सुना होगा। इससे कुछ अलग प्राचीन काल से ही भारत में ऐसी कई विद्याएं प्रचलन में रही जिसे आधुनिक युग में अंधविश्वास या काला जादू मानकर खारिज कर दिया गया, लेकिन अब उन्हीं विद्याओं पर जब पश्‍चिमी वैज्ञानिकों ने शोध किया तब पता चला कि कुछ-कुछ इसमें सच्चाई है।

 

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